Destruction of Nalanda university of Bihar By BHAKTIAR KHILJI

नालंदाविश्वविद्यालयनकोक्योंजलायागयाथा..?
जानिएसच्चाई …??


एकसनकीऔरचिड़चिड़ेस्वभाववालातुर्कलूटेराथा….बख्तियारखिलजी.
इसने११९९इसेजलाकरपूर्णतःनष्टकरदिया।
उसनेउत्तरभारतमेंबौद्धोंद्वाराशासित
कुछक्षेत्रोंपरकब्ज़ाकरलियाथा.
एकबारवहबहुतबीमारपड़ाउसकेहकीमोंने
उसकोबचानेकीपूरीकोशिशकरली …
मगरवहठीकनहींहोसका.
किसीनेउसकोसलाहदी…
नालंदाविश्वविद्यालयकेआयुर्वेदविभागके
प्रमुखआचार्यराहुलश्रीभद्र
जीकोबुलायाजायऔरउनसेभारतीय
विधियोंसेइलाजकरायाजाय
उसेयहसलाहपसंदनहींथीकिकोईभारतीय
वैद्य …
उसकेहकीमोंसेउत्तमज्ञानरखतेहोऔर
वहकिसीकाफ़िरसे .उसकाइलाजकरवाए
फिरभीउसेअपनीजानबचानेकेलिए
उनकोबुलानापड़ा
उसनेवैद्यराजकेसामनेशर्तरखी…
मैंतुम्हारीदीहुईकोईदवानहींखाऊंगा…
किसीभीतरहमुझेठीककरों …
वर्ना …मरनेकेलिएतैयाररहो.
बेचारेवैद्यराजकोनींदनहींआई… बहुत
उपायसोचा…
अगलेदिनउससनकीकेपासकुरानलेकर
चलेगए..
कहा…इसकुरानकीपृष्ठसंख्या … इतनेसे
इतनेतकपढ़लीजिये… ठीकहोजायेंगे…!
उसनेपढ़ाऔरठीकहोगया ..
जीगया…
उसकोबड़ीझुंझलाहट
हुई…उसकोख़ुशीनहींहुई
उसकोबहुतगुस्साआयाकि … उसके
मुसलमानीहकीमोंसेइनभारतीय
वैद्योंकाज्ञानश्रेष्ठक्योंहै…!
बौद्धधर्मऔरआयुर्वेदकाएहसानमानने
केबदले …उनकोपुरस्कारदेनातोदूर …
उसनेनालंदाविश्वविद्यालयमेंहीआग
लगवादिया …पुस्तकालयोंकोहीजलाके
राखकरदिया…!
वहांइतनीपुस्तकेंथींकि …आग
लगीभीतोतीनमाहतकपुस्तकेंधूधूकरके
जलतीरहीं
उसनेअनेकधर्माचार्यऔरबौद्धभिक्षुमार
डाले.
आजभीबेशरमसरकारें…उसनालायक
बख्तियारखिलजीकेनामपररेलवेस्टेशन
बनायेपड़ीहैं… !
उखाड़फेंकोइनअपमानजनकनामोंको…
मैंनेयहतोबतायाहीनहीं… कुरानपढ़केवह
कैसेठीकहुआथा.
हमहिन्दूकिसीभीधर्मग्रन्थकोजमीनपर
रखकेनहींपढ़ते…
थूकलगाकेउसकेपृष्ठनहींपलटते
मिएँठीकउलटाकरतेहैं….. कुरानकेहरपेज
कोथूकलगालगाकेपलटतेहैं…!
बस…
वैद्यराजराहुलश्रीभद्रजीनेकुरानकेकुछ
पृष्ठोंकेकोनेपरएकदवाकाअदृश्यलेप
लगादियाथा…
वहथूककेसाथमात्रदसबीसपेजचाट
गया…ठीकहोगयाऔरउसनेइसएहसान
काबदलानालंदाकोनेस्तनाबूतकरकेदिया
आईयेअबथोड़ानालंदाकेबारेमेंभीजान
लेतेहै
यहप्राचीनभारतमेंउच्च्
शिक्षाकासर्वाधिकमहत्वपूर्णऔर
विख्यातकेन्द्रथा।महायानबौद्धधर्मके
इसशिक्षा-केन्द्रमेंहीनयानबौद्ध-धर्मके
साथहीअन्यधर्मोंकेतथाअनेकदेशोंके
छात्रपढ़तेथे।वर्तमानबिहारराज्यमें
पटनासे 88.5 किलोमीटरदक्षिण–पूर्व
औरराजगीरसे 11.5 किलोमीटरउत्तरमें
एकगाँवकेपासअलेक्जेंडरकनिंघम
द्वाराखोजेगएइसमहानबौद्ध
विश्वविद्यालयकेभग्नावशेषइसकेप्राचीन
वैभवकाबहुतकुछअंदाज़करादेतेहैं।अनेक
पुराभिलेखोंऔरसातवींशतीमेंभारतभ्रमण
केलिएआयेचीनीयात्रीह्वेनसांग
तथाइत्सिंगकेयात्राविवरणोंसेइस
विश्वविद्यालयकेबारेमेंविस्तृत
जानकारीप्राप्तहोतीहै।प्रसिद्ध
चीनीयात्रीह्वेनसांगने 7वींशताब्दीमें
यहाँजीवनकामहत्त्वपूर्णएकवर्षएक
विद्यार्थीऔरएकशिक्षककेरूपमेंव्यतीत
कियाथा।प्रसिद्ध ‘बौद्धसारिपुत्र’
काजन्मयहींपरहुआथा।
स्थापनावसंरक्षण
इसविश्वविद्यालयकीस्थापनाकाश्रेय
गुप्तशासककुमारगुप्तप्रथम४५०-४७०
कोप्राप्तहै।इसविश्वविद्यालयकोकुमार
गुप्तकेउत्तराधिकारियोंकापूरासहयोग
मिला।गुप्तवंशकेपतनकेबादभीआनेवाले
सभीशासकवंशोंनेइसकीसमृद्धिमें
अपनायोगदानजारीरखा।इसेमहानसम्राट
हर्षवर्द्धनऔरपाल
शासकोंकाभीसंरक्षणमिला।स्थानिए
शासकोंतथाभारतकेविभिन्नक्षेत्रोंके
साथहीइसेअनेकविदेशीशासकोंसे
भीअनुदानमिला।
स्वरूप
यहविश्वकाप्रथमपूर्णतःआवासीय
विश्वविद्यालयथा।विकसितस्थितिमेंइसमें
विद्यार्थियोंकीसंख्याकरीब१०,०००एवं
अध्यापकोंकीसंख्या२०००थी।इस
विश्वविद्यालयमेंभारतकेविभिन्न
क्षेत्रोंसेहीनहींबल्किकोरिया, जापान,
चीन, तिब्बत, इंडोनेशिया, फारस
तथातुर्कीसेभीविद्यार्थीशिक्षाग्रहण
करनेआतेथे।नालंदाकेविशिष्ट
शिक्षाप्राप्तस्नातकबाहरजाकरबौद्ध
धर्मकाप्रचारकरतेथे।इसविश्वविद्यालय
कीनौवींशतीसेबारहवींशतीतक
अंतरर्राष्ट्रीयख्यातिरहीथी।
परिसर
अत्यंतसुनियोजितढंगसेऔरविस्तृतक्षेत्र
मेंबनाहुआयहविश्वविद्यालयस्थापत्य
कलाकाअद्भुतनमूनाथा।
इसकापूरापरिसरएकविशालदीवारसे
घिराहुआथाजिसमेंप्रवेशकेलिएएकमुख्य
द्वारथा।उत्तरसेदक्षिणकीओर
मठोंकीकतारथीऔरउनकेसामनेअनेक
भव्यस्तूपऔरमंदिरथे।मंदिरोंमेंबुद्ध
भगवानकीसुन्दरमूर्तियाँस्थापितथीं।
केन्द्रीयविद्यालयमेंसातबड़ेकक्षथेऔर
इसकेअलावातीनसौअन्यकमरेथे।इनमें
व्याख्यानहुआकरतेथे।अभीतकखुदाईमें
तेरहमठमिलेहैं।वैसेइससेभीअधिकमठोंके
होनेहीसंभावनाहै।मठएकसेअधिकमंजिल
केहोतेथे।कमरेमेंसोनेकेलिएपत्थर
कीचौकीहोतीथी।दीपक, पुस्तक
इत्यादिरखनेकेलिएआलेबनेहुएथे।
प्रत्येकमठकेआँगनमेंएककुआँबनाथा।
आठविशालभवन, दसमंदिर, अनेक
प्रार्थनाकक्षतथाअध्ययनकक्षके
अलावाइसपरिसरमेंसुंदरबगीचेतथाझीलें
भीथी।
प्रबंधन
समस्तविश्वविद्यालयकाप्रबंध
कुलपतियाप्रमुखआचार्यकरतेथे
जोभिक्षुओंद्वारानिर्वाचितहोतेथे।
कुलपतिदोपरामर्शदात्रीसमितियोंके
परामर्शसेसाराप्रबंधकरतेथे।प्रथम
समितिशिक्षातथापाठ्यक्रमसंबंधीकार्य
देखतीथीऔरद्वितीयसमितिसारे
विश्वविद्यालयकीआर्थिक
व्यवस्थातथाप्रशासनकीदेख–भाल
करतीथी।विश्वविद्यालयकोदानमेंमिले
दोसौगाँवोंसेप्राप्तउपजऔरआय
कीदेख–रेखयहीसमितिकरतीथी।इसीसे
सहस्त्रोंविद्यार्थियोंकेभोजन, कपड़े
तथाआवासकाप्रबंधहोताथा।
आचार्य
इसविश्वविद्यालयमेंतीनश्रेणियोंके
आचार्यथेजोअपनीयोग्यतानुसारप्रथम,
द्वितीयऔरतृतीयश्रेणीमेंआतेथे।
नालंदाकेप्रसिद्धआचार्योंमेंशीलभद्र,
धर्मपाल, चंद्रपाल, गुणमतिऔर
स्थिरमतिप्रमुखथे। 7वींसदीमेंह्वेनसांग
केसमयइसविश्वविद्यालयकेप्रमुख
शीलभद्रथेजोएकमहानआचार्य, शिक्षक
औरविद्वानथे।एकप्राचीनश्लोकसे
ज्ञातहोताहै, प्रसिद्धभारतीयगणितज्ञ
एवंखगोलज्ञआर्यभटभीइस
विश्वविद्यालयकेप्रमुखरहेथे।उनकेलिखे
जिनतीनग्रंथोंकीजानकारीभीउपलब्धहै
वेहैं: दशगीतिका, आर्यभट्टीयऔरतंत्र।
ज्ञाताबतातेहैं, किउनकाएकअन्यग्रन्थ
आर्यभट्टसिद्धांतभीथा, जिसकेआजमात्र
३४श्लोकहीउपलब्धहैं।इसग्रंथ
का७वींशताब्दीमेंबहुतउपयोगहोताथा।
प्रवेशकेनियम
प्रवेशपरीक्षाअत्यंतकठिनहोतीथीऔर
उसकेकारण
प्रतिभाशालीविद्यार्थीहीप्रवेशपासकते
थे।उन्हेंतीनकठिन
परीक्षास्तरोंकोउत्तीर्णकरनाहोताथा।
यहविश्वकाप्रथमऐसादृष्टांतहै।शुद्ध
आचरणऔरसंघकेनियमोंकापालन
करनाअत्यंतआवश्यकथा।
अध्ययन-अध्यापनपद्धति
इसविश्वविद्यालयमेंआचार्य
छात्रोंकोमौखिकव्याख्यान
द्वाराशिक्षादेतेथे।इसकेअतिरिक्त
पुस्तकोंकीव्याख्याभीहोतीथी।
शास्त्रार्थहोतारहताथा।दिनकेहरपहर
मेंअध्ययनतथाशंकासमाधान
चलतारहताथा।
अध्ययनक्षेत्र
यहाँमहायानकेप्रवर्तकनागार्जुन,
वसुबन्धु, असंगतथाधर्मकीर्तिकीरचनाओं
कासविस्तारअध्ययनहोताथा।वेद, वेदांत
औरसांख्यभीपढ़ायेजातेथे।व्याकरण,
दर्शन, शल्यविद्या, ज्योतिष, योगशास्त्र
तथाचिकित्साशास्त्रभीपाठ्यक्रमके
अन्तर्गतथे।नालंदाकिखुदाईमेंमिलिअनेक
काँसेकीमूर्तियोँकेआधारपरकुछ
विद्वानोंकामतहैकिकदाचित्धातु
कीमूर्तियाँबनानेकेविज्ञान
काभीअध्ययनहोताथा।यहाँखगोलशास्त्र
अध्ययनकेलिएएकविशेषविभागथा।
पुस्तकालय
नालंदामेंसहस्रोंविद्यार्थियोंऔर
आचार्योंकेअध्ययनकेलिए, नौतलकाएक
विराटपुस्तकालयथाजिसमें३लाखसे
अधिकपुस्तकोंकाअनुपमसंग्रहथा।इस
पुस्तकालयमेंसभीविषयोंसेसंबंधितपुस्तकें
थी।यह ‘रत्नरंजक’ ‘रत्नोदधि’ ‘रत्नसागर’
नामकतीनविशालभवनोंमेंस्थितथा।
‘रत्नोदधि’ पुस्तकालयमेंअनेकअप्राप्य
हस्तलिखितपुस्तकेंसंग्रहीतथी।इनमेंसे
अनेक
पुस्तकोंकीप्रतिलिपियाँचीनीयात्रीअपने
साथलेगयेथे।

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